गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
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बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, राज्यों को तीन महीने

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को बुजुर्ग व गंभीर रूप से बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए एक समान नीति बनाने को कहा।

खुलते जेल के दरवाजे के पास बैठे एक बुजुर्ग कैदी के हाथ और बाहर आती रोशनी का सांकेतिक दृश्य
मानवीय आधार पर समयपूर्व रिहाई से जुड़ी खबर का सांकेतिक संपादकीय चित्र।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की जेल व्यवस्था में लंबे समय से बने एक मानवीय सवाल पर समयबद्ध हस्तक्षेप किया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अधिक उम्र या अंतिम चरण की बीमारी से जूझ रहे कैदियों की जल्द अथवा समयपूर्व रिहाई के लिए व्यापक नीति बनाएं और उसे तीन महीने के भीतर अधिसूचित करें।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया। अदालत का जोर केवल नीति तैयार करने पर नहीं, बल्कि पूरे देश में ऐसे मामलों के लिए एक पारदर्शी और समान प्रक्रिया बनाने पर है। अभी अलग-अलग राज्यों के नियम, सजा समीक्षा बोर्ड और निर्णय की गति काफी अलग हो सकती है।

ई-प्रिजन्स पोर्टल से जुड़ेगी प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने समयपूर्व रिहाई के आवेदन और उनके निस्तारण को ई-प्रिजन्स पोर्टल से जोड़ने का निर्देश भी दिया है। इससे आवेदन कब आया, किस स्तर पर लंबित है और उस पर क्या फैसला हुआ—इन सबका डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकेगा। जेल प्रशासन में देरी और अस्पष्टता की शिकायतों के बीच यह हिस्सा आदेश को व्यवहारिक महत्व देता है।

अदालत का आदेश अपने आप सामूहिक रिहाई नहीं करता। हर मामले में अपराध की प्रकृति, काटी गई सजा, कैदी का आचरण, उम्र, बीमारी की गंभीरता और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे पहलुओं का मूल्यांकन होगा। फर्क यह होगा कि बुजुर्ग या टर्मिनल बीमारी वाले कैदी की अर्जी केवल फाइलों में पड़ी न रहे और फैसले के लिए स्पष्ट मानक व समयसीमा हो।

जेलों पर दबाव, गरिमा का सवाल

भारत की कई जेलें क्षमता से अधिक कैदियों का बोझ उठा रही हैं। वृद्ध कैदियों को नियमित इलाज, सहायक उपकरण और निरंतर देखभाल की जरूरत होती है, जिसके लिए जेल अस्पताल अक्सर पर्याप्त नहीं होते। वहीं दंड व्यवस्था का उद्देश्य केवल बंद रखना नहीं, सुधार और न्यायसंगत व्यवहार भी है। अदालत का संदेश है कि उम्र और असाध्य बीमारी की अवस्था में राज्य को सजा के साथ मानवीय गरिमा का संतुलन भी देखना होगा।

अगले तीन महीने असली परीक्षा होंगे। नीति का मसौदा बन जाना पर्याप्त नहीं; मेडिकल मूल्यांकन स्वतंत्र हो, परिवार तक पहुंच की जांच हो और समीक्षा बोर्ड नियमित बैठें—तभी आदेश जमीन पर असर दिखाएगा। ई-प्रिजन्स एक निगरानी ढांचा दे सकता है, लेकिन अंतिम जवाबदेही राज्य सरकारों और जेल प्रशासन की ही रहेगी।

तथ्य-स्रोत: आकाशवाणी समाचार, 16 जुलाई 2026। चित्र AI-निर्मित सांकेतिक संपादकीय दृश्य है।

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