गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
टेक्नोलॉजी

देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कल भरेगी रफ्तार, जींद–सोनीपत रूट से शुरू होगा नया अध्याय

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन 17 जुलाई को जींद–सोनीपत रूट पर शुरू होगी। जानिए इसकी ताकत, रफ्तार और तकनीक क्यों अहम है।

हरियाणा के खेतों के बीच दौड़ती नीले और सफेद रंग की आधुनिक हाइड्रोजन ट्रेन का सांकेतिक दृश्य
भारत की पहली हाइड्रोजन यात्री ट्रेन का सांकेतिक संपादकीय चित्र।

नई दिल्ली: भारतीय रेल 17 जुलाई को एक ऐसे सफर की शुरुआत करने जा रही है जिसमें इंजन से धुआं नहीं, पानी की भाप निकलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन यात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। यह ट्रेन जींद और सोनीपत के बीच चलेगी और भारत को हाइड्रोजन रेल तकनीक संचालित करने वाले चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करेगी।

ट्रेन का डिजाइन, इंजीनियरिंग और इंटीग्रेशन भारत में हुआ है। दस डिब्बों वाली इस ट्रेन में 3,200 हॉर्स पावर का प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। डिजाइन के स्तर पर इसकी अधिकतम रफ्तार 110 किलोमीटर प्रति घंटे है, हालांकि जींद–सोनीपत सेक्शन पर इसे 75 किलोमीटर प्रति घंटे तक चलाया जाएगा। लंबाई और ताकत—दोनों लिहाज से इसे दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी हाइड्रोजन यात्री ट्रेनों में गिना जा रहा है।

बिजली ट्रेन से अलग कैसे काम करेगी?

हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन के भीतर ही बिजली बनाता है। हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से पैदा हुई बिजली मोटर को चलाती है और उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी की भाप निकलती है। इसका मतलब है कि संचालन के दौरान डीजल इंजन जैसा कार्बन उत्सर्जन नहीं होगा। लगातार ओवरहेड तार की जरूरत भी नहीं पड़ती, इसलिए ऐसी तकनीक उन रूटों पर खास उपयोगी हो सकती है जहां पूर्ण विद्युतीकरण महंगा या कठिन है।

ट्रेन में हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग और धुएं की पहचान के लिए कई स्तरों वाली सुरक्षा प्रणाली लगाई गई है। फ्यूल सेल और स्टोरेज सिस्टम के कारण सुरक्षा इस परियोजना की सबसे कड़ी कसौटी है। शुरुआती संचालन से मिले डेटा पर ही तय होगा कि तकनीक को दूसरे गैर-विद्युतीकृत रूटों तक कितनी तेजी से बढ़ाया जा सकता है।

‘ग्रीन’ होने की असली परीक्षा

ट्रेन का टेलपाइप उत्सर्जन शून्य होना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन पूरे पर्यावरणीय लाभ का फैसला इस बात से होगा कि इस्तेमाल होने वाला हाइड्रोजन किस स्रोत से बना है। यदि उत्पादन अक्षय ऊर्जा से बने ग्रीन हाइड्रोजन पर आधारित होगा, तभी डीजल के मुकाबले जीवन-चक्र उत्सर्जन में बड़ी कमी आएगी। इसलिए यह लॉन्च केवल एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि भारत की ग्रीन हाइड्रोजन सप्लाई चेन की भी परीक्षा है।

जींद–सोनीपत सेवा सफल रही तो रेलवे को कम यात्री घनत्व वाले रूटों पर स्वच्छ विकल्प मिल सकता है। यात्रियों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा बदलाव शांत सफर और कम प्रदूषण होगा; रेलवे के लिए यह भविष्य की तकनीक को रोजमर्रा के संचालन में साबित करने का मौका है।

तथ्य-स्रोत: आकाशवाणी समाचार, 16 जुलाई 2026। चित्र AI-निर्मित सांकेतिक संपादकीय दृश्य है।

यह ख़बर साझा करें: