गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट में खुद बहस करने वालों के लिए नियम कड़े, लाइव-स्ट्रीमिंग पर शर्त

सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने litigants-in-person को पहले वर्चुअल सुनवाई का विकल्प देने और शारीरिक पेशी पर लाइव-स्ट्रीमिंग व वीडियो रिकॉर्डिंग रोकने की शर्त तय की है।

सुप्रीम कोर्ट में litigants-in-person और वर्चुअल सुनवाई नियमों पर प्रतिनिधि संपादकीय दृश्य
सुप्रीम कोर्ट ने खुद पेश होने वाले पक्षकारों के लिए वर्चुअल पेशी और लाइव-स्ट्रीमिंग से जुड़ी नई शर्तें तय की हैं। यह प्रतिनिधि संपादकीय दृश्य है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपना पक्ष रखने वाले पक्षकारों (parties-in-person/litigants-in-person) के लिए अदालत में पेशी की प्रक्रिया कड़ी कर दी है। 15 जुलाई 2026 को हुई पूर्ण पीठ की बैठक में तय किया गया कि ऐसे पक्षकारों को रजिस्ट्रार के साथ शुरुआती बातचीत के दौरान पहले वर्चुअल माध्यम से पेश होने का विकल्प दिया जाएगा। यदि वे फिर भी शारीरिक रूप से अदालत में पेश होने पर जोर देते हैं, तो उनकी कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग और वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं होगी।

यह प्रशासनिक फैसला 10 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम में हुई अव्यवस्था के बाद आया है। उस दिन petitioner-in-person प्रबल प्रताप सिंह ने सुनवाई के दौरान कथित तौर पर कागज फेंके, अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और कार्यवाही बाधित की। बाद में दिल्ली पुलिस ने प्रबल प्रताप सिंह और चंदर भान को गिरफ्तार किया। बार एंड बेंच और अन्य कानूनी रिपोर्टों के अनुसार, 15 जुलाई को पटियाला हाउस कोर्ट ने दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा।

क्या बदला

मौजूदा व्यवस्था में Supreme Court Rules, 2013 के Order IV Rule 1(c) के तहत जो पक्षकार वकील के बिना खुद मुकदमा लड़ना चाहता है, उसे रजिस्ट्रार से बातचीत कर यह बताना होता है कि वह वकील क्यों नियुक्त नहीं कर रहा। अब उसी चरण में रजिस्ट्रार उसे वर्चुअल मोड से पेश होने का विकल्प देगा।

यदि litigant-in-person शारीरिक पेशी ही चाहता है, तो अदालत उसे अनुमति दे सकती है, लेकिन उस सुनवाई को सार्वजनिक लाइव-स्ट्रीम या वीडियो रिकॉर्डिंग का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इसे कोर्टरूम की गरिमा और सुनवाई की व्यवस्था बनाए रखने से जुड़ा कदम माना है।

क्यों अहम है फैसला

सुप्रीम कोर्ट में लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य पारदर्शिता और खुले न्याय की पहुंच बढ़ाना रहा है। लेकिन 10 जुलाई की घटना के बाद अदालत के सामने अलग प्रश्न खड़ा हुआ: किसी पक्षकार की अव्यवस्थित या उकसाऊ हरकत को लाइव प्रसारण के जरिए फैलने से कैसे रोका जाए, और साथ ही self-represented litigants की न्याय तक पहुंच भी कैसे बनी रहे। नई व्यवस्था इसी संतुलन की कोशिश है।

इसका असर उन लोगों पर पड़ेगा जो बिना वकील के सुप्रीम कोर्ट में पेश होते हैं। उनके लिए अदालत के दरवाजे बंद नहीं किए गए हैं, लेकिन physical appearance को अब लाइव-स्ट्रीमिंग के अधिकार या सुविधा से स्वतः जोड़ा नहीं जाएगा। वर्चुअल पेशी को प्राथमिक विकल्प बनाकर रजिस्ट्री भीड़, सुरक्षा और कोर्टरूम प्रबंधन पर नियंत्रण बढ़ा सकेगी।

10 जुलाई की घटना का क्रम

कानूनी समाचार पोर्टलों और पुलिस-संबंधी रिपोर्टों के अनुसार, 10 जुलाई 2026 को प्रबल प्रताप सिंह सुप्रीम कोर्ट में petitioner-in-person के रूप में पेश हुए थे। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था। सुनवाई न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ के सामने हुई। रिपोर्टों में कहा गया कि उन्होंने न्यायाधीशों को असामान्य तरीके से संबोधित किया, केस के कागज हवा में फेंके और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया।

पीठ ने उसी समय उनके खिलाफ अवमानना जैसी कठोर कार्यवाही शुरू नहीं की और आदेश में कहा कि वह उनकी स्थिति को देखते हुए कार्रवाई से परहेज कर रही है। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षा कर्मियों की शिकायत पर तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज हुई और दोनों कानून छात्रों की गिरफ्तारी हुई।

बाकी प्रशासनिक फैसले

पूर्ण पीठ की बैठक में सिर्फ parties-in-person पर फैसला नहीं हुआ। लाइव लॉ और ट्रिब्यून की रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे के लिए लगभग 100 बंच मामलों को प्राथमिकता से सूचीबद्ध करने का निर्णय भी लिया है, जिनसे करीब 9,177 जुड़े मामलों के निपटारे की संभावना बताई गई है। रिपोर्टों में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 96,038 बताई गई।

बैठक में यह भी तय हुआ कि इस विशेष कवायद के बाद नोटिस जारी हो चुके सबसे पुराने मामलों को मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को प्राथमिकता दी जाएगी। कॉज लिस्ट को सरल और अधिक समान बनाने के लिए न्यायाधीशों की एक समिति बनाने तथा अंतिम सुनवाई वाले मामलों में वकीलों से मौखिक दलीलों के लिए आवश्यक समय बताने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।

अगला व्यावहारिक बदलाव रजिस्ट्री स्तर पर दिखेगा। नए self-represented litigants को रजिस्ट्रार के साथ बातचीत में वर्चुअल उपस्थिति का विकल्प मिलेगा, और जो पक्षकार physical mode चुनेंगे, उन्हें यह स्पष्ट शर्त स्वीकार करनी होगी कि उनकी सुनवाई लाइव-स्ट्रीम या रिकॉर्ड नहीं की जाएगी।

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